चैतन्य महाप्रभु ने भारत के पहले सविनय अवज्ञा (सिविल डिसओबेडिएंस) आंदोलन का नेतृत्व किया

भारत को हमेशा उस भूमि के रूप में महिमा मंडित किया जाता है जहां पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं और स्थानो को पवित्र करती हैं। पर्वतों के राजा, हिमालय, उसके मुकुट के रूप में उसकी महिमा गाते हैं। यह वह भूमि है जहाँ भगवान राम और भगवान कृष्ण ने कई लीला किए| वे इस धरती पर चलते थे, वे नाचते थे, वे गाते थे और इस धन्य भूमि में खेलते थे।

लेकिन दुख की बात यह है कि हमारे इस महान राष्ट्र का धीरे-धीरे पतन होने लगा| शास्त्र बताते हैं कि कलयुग में , जिसमें हम वर्तमान में रह रहे हैं, अधर्म को प्रमुखता मिलती है| तो यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भारतीय समाज जिसकी जड़ें आध्यात्मिकता में है उसकी संस्कृति और मूल्यों में गिरावट होनी शुरू हो गयी|

कई विदेशी आक्रमणकारियों ने देश पर धन-दौलत लूटने के लिए हमला करना शुरू कर दिया। हजारों मंदिरों को उजाड़ दिया गया, और हजारों लोगों को अपना धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।

भले ही लोगों ने धार्मिक प्रथाओं को जारी रखा लेकिन वे हमेशा सताए जाने से डरते रहे।

सिर्फ विदेशी आक्रमणकारी ही नहीं जिनसे लोग डरते थे बल्कि वे जातिगत ब्राह्मणों से भी डरते थे। क्योंकि अयोग्य ब्राह्मण लोगों का शोषण कर रहे थे।

लोग चेतना के उत्थान या प्रभु के साथ संबंध विकसित करने के लिए धर्म का पालन नहीं कर रहे थे। इसके बजाय, वेदों की भावना के खिलाफ होने वाले अनुष्ठानों को प्रमुखता मिली। लोग पूरी तरह से भौतिकवादी हो गए थे।

एक क्रांतिकारी सुधारक का जन्म

चैतन्य महाप्रभु उस दौरान प्रकट हुए जब भारत भीतर और बाहर से पीड़ित था। उन्होंने १४८६ में मायापुर, नवद्वीप, पश्चिम बंगाल में जन्म लिया।

अपने उपदेशों के माध्यम से, उन्होंने अयोग्य ब्राह्मणों के एकाधिकार को समाप्त कर दिया जिन्होंने एक कठोर वंशानुगत जाति व्यवस्था की स्थापना की थी। यह जाति व्यवस्था वेदों की शिक्षाओं के विरुद्ध थी।

जाति ब्राह्मणों के नियमों के अनुसार सामान्य जन को देवताओं की पूजा करने, वैदिक शास्त्रों को पढ़ने, कोई भी अनुष्ठान करने और किसी भी मंत्र का जाप करने की मनाही थी। उन्होंने स्वयं को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया था|  उनके माध्यम से ही कोई भगवान से कोई आशीर्वाद प्राप्त कर सकता था|

शास्त्र कभी किसी को दूसरों के साथ भेदभाव करने के लिए नहीं कहता है। वेद जिस सामाजिक विभाजन की बात करता है, वह समाज के सुचारू संचालन के लिए है। यह विभाजन जन्म पर नहीं बल्कि किसी के काम पर आधारित है। (भगवद गीता ४.१३)

चैतन्य महाप्रभु वेदों की सच्ची शिक्षाओं को फिर से स्थापित करने के लिए आए थे। महाप्रभु ने अन्यायपूर्ण जाति व्यवस्था की बेड़ियों को तोड़ दिया और सभी को भगवान की भक्ति करने का समान अवसर दिया।

संकीर्तन आंदोलन का जन्म

उन्होंने संकीर्तन आंदोलन की शुरुआत की। संकीर्तन का अर्थ है हरे कृष्ण महामंत्र का सामूहिक जप।

श्रीमद-भागवतम (१२.३.५१) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हरे कृष्ण का जप ही एकमात्र प्रभावी तरीका है जिसके द्वारा कलियुग में मोक्ष प्राप्त होता है।

हरे कृष्ण महामंत्र कोई नया मंत्र नहीं था। जप करना कोई नई प्रक्रिया नहीं थी। वास्तव में हरे कृष्ण महामंत्र का जप अनंत काल से चला आ रहा है। सिर्फ धरती पर ही नहीं बल्कि स्वर्गीय ग्रहों पर भी इस मंत्र का जप किया जाता है।

लेकिन दुर्भाग्य से, लोग भूल गए थे और इसलिए पीड़ित थे। जप व्यक्तिगत रूप से किया जा सकता है और जब एक साथ कई लोगों के साथ किया जाता है, तो यह संकीर्तन बन जाता है।

सभी भगवान के नामों का जप करने के पात्र थे। तथाकथित ऊंची जाति और निम्न जाति, पुरुष और महिलाएं, अमीर और गरीब, हिंदू और गैर-हिंदू सभी जप करने के योग्य थे। अपने जीवन में पहली बार वे भगवान के साथ एक गहरे संबंध का अनुभव करने लगे।

लाखों लोग जप करने लगे

नवद्वीप के लगभग हर घर में लोग कृष्ण के नाम का जप कर रहे थे। और जिन दुर्भाग्यपूर्ण लोगों ने जप करने से इनकार कर दिया, उन्होंने हमेशा कृष्ण का नाम सुना। यह जंगल की आग की तरह फैल गया।

इस आग ने जाति ब्राह्मणों के आधिपत्य को भी नष्ट करना शुरू कर दिया। वे बेहद गुस्से में थे।

मुस्लिम शासकों को डर था कि जप सभी हिंदुओं को एकजुट कर देगा| और एकजुट हिंदू हमें उखाड़ फेंकेंगे। उन्होंने कई गैर-हिंदुओं को संकीर्तन मंडली में भाग लेते देखा, जो बहुत चिंता का कारण था।

जाति ब्राह्मणों ने मुस्लिम शासकों से संपर्क किया। उन्होंने मिलकर संकीर्तन आंदोलन को रोकने की योजना तैयार की।नवद्वीप के तत्कालीन मजिस्ट्रेट चाँद काजी ने एक आदेश जारी किया।

‘तुरंत जप बंद करो। आदेश की अवहेलना करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी।’

उनके सैनिक जप के खिलाफ लोगों को चेतावनी देते हुए घरों में गए। उन्होंने श्रीवास ठाकुर के घर पर एक मृदंग को भी तोड़ दिया, जो चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे।

सभी पुरुष और महिलाएं जो भगवान के नामों का जप आनंद के साथ कर रहे थे, बहुत भयभीत हो गए।

उन्हें अब अपने धर्म का पालन करने की कोई स्वतंत्रता नहीं थी।

उनके पास अब केवल दो विकल्प थे।

यदि वे रहते थे तो वे जप बंद करना चाहते थे।

लेकिन अगर वे जप करना चाहते थे तो उन्हें अपनी जान देनी पड़ती है।

विरोध करने के लिए लाखों लोग सड़क पर आ गए

उन्होंने चैतन्य महाप्रभु से संपर्क किया जो उनके नेता थे। उन्हें अपने अनुयायियों की जान बचानी थी।

‘भगवान के नाम का जप कोई नहीं रोक सकता। किसी को भी भय में नहीं रहना चाहिए। हम भेदभावपूर्ण आदेश की विरोध करेंगे।“

चैतन्य महाप्रभु के स्पष्ट आह्वान ने सभी को बहुत आशा दी। उन्हें चैतन्य महाप्रभु के नेतृत्व में पूरा विश्वास था।महाप्रभु ने हजारों अनुयायियों के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। सैकड़ों साल बाद गांधीजी ने इसे ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।

हजारों मृदंगों और करताल को लेकर एक लाख लोग निर्भय होकर सड़क पर आ गए। उन्होंने जोर से हरे कृष्ण महामन्त्र का जाप किया। उन्होंने गाया और उन्होंने नवद्वीप की सड़कों पर नृत्य किया।हरे कृष्ण महामंत्र को हर जगह सुना जा सकता था |

वे काजी के घर तक मार्च करने लगे। काजी के शक्तिशाली सैनिक असहाय थे, वे भाग गए।

चैतन्य महाप्रभु आदेश को चुनौती देना चाहते थे| उन्होंने काजी से मिलने का फैसला किया। विशाल भीड़ मीलों तक फैली थी। काज़ी ने अपने घर के भीतरी कक्षों में खुद को छिपा लिया। वह अनिच्छा से बाहर आया।

चैतन्य महाप्रभु ने अन्यायी शासक से लंबी बातचीत की।महाप्रभु उनके साथ कठोर नहीं थे। वह उसे नुकसान पहुंचाने के लिए वहां नहीं थे| उन्होंने विनम्रता से लेकिन तार्किक रूप से बात की। उनके तर्क का बहुत प्रभाव पड़ा। काजी को अपनी गलती समझ में आ गई। उसका हृदय अब परिवर्तित हो गया था।

उसकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा, “कोई भी इस संकीर्तन आंदोलन को कभी नहीं रोकेगा। मेरे वंशज भी इसे नहीं रोकेंगे।” चैतन्य चरितामृत, पाठ २२२।

भक्त खुश थे। वे अब कृष्ण की भक्ति करने के लिए स्वतंत्र थे।चैतन्य महाप्रभु एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। उन्होंने विश्वव्यापी संकीर्तन आंदोलन की नींव रखी। वेदों में उनके आगमन की भविष्यवाणी की गई है – श्रीमद्भागवतम् ११.५.३२, महाभारत, आदि पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण।

संकीर्तन आंदोलन दुनिया भर में फैल गया है

इस्कॉन के संस्थापक आचार्य श्रील प्रभुपाद ने संकीर्तन आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।वह श्री चैतन्य महाप्रभु के सबसे बड़े अनुयायियों में से एक हैं।

उन्होंने अथक परिश्रम किया ताकि इस दुनिया के लाखों लोगों को चैतन्य महाप्रभु की कृपा मिले। आज हम हजारों भक्तों को दुनिया के प्रमुख शहरों में हरे कृष्ण महामंत्र का आनंदपूर्वक जप करते देखते हैं। लंदन हो या न्यूयॉर्क, मॉस्को हो या केप टाउन, मुंबई हो या सिडनी हर जगह आपको कृष्ण के भक्त दिखते हैं।

नवद्वीप में लगभग 500 साल पहले श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा शुरू किया गया संकीर्तन आंदोलन दुनिया भर में फैल चुका है और लाखों लोग अब इसमें भाग ले रहे हैं।

श्री चैतन्य महाप्रभु हमें सिखाने आए कि हम सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। इसलिए जाति, पंथ, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

साथ ही साधकों को निर्भय होकर कृष्ण की भक्ति करनी चाहिए। और पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि महाप्रभु किसी भी कठिन परिस्थिति में हमारी रक्षा करेंगे।

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